Thursday, November 15, 2018

“दुख की पोटली”

एक आदमी निरन्तर रोता था, जाके चर्च  में कि, “हे प्रभु, मुझे इतना दुखी क्यों बनाया? आख़िर मैंने तेरा क्या बिगाड़ा है? ये अन्याय हो रहा है। और मैं तो सुनता था, तू बड़ा न्यायी है, प्रेमी  है, दयालु  है, कृपालु है,महाकरुणावान है! मगर सब धोखे की बातें हैं। मुझे इतना दुख क्यों दिया? सब मज़े में हैं। सब आनन्द कर रहे हैं। मैं ही दुख में सड़ा जा रहा हूँ। कुछ कृपा कर! अगर सुख न दे सके तो कम से कम इतना तो कर कि किसी और का दुख मुझे दे दे, ये मेरा दुख किसी और को दे दे। इतना तो कर!”

उसने एक रात सपना देखा कि कोई आवाज़ आकाश से कह रही है कि, “सब लोग अपने-अपने दुख लेके चर्च  पहुँच जाएँ। वो तो बड़ी जल्दी तैयार हो गया। उसने जल्दी से अपना दुख बाँधा, पोटली उठाई, भागा चर्च  की तरफ़। ख़ुद भी भागा, उसने देखा, बड़ा हैरान हुआ, पूरे गाँव के लोग अपनी-अपनी पोटलियाँ लिए जा रहे हैं।

वो तो सोचता था जिनके जीवन में कोई भी दुख नहीं है...राजा भी भागा जा रहा है! वज़ीर भी भागे जा रहे हैं। नेता भी भागे जा रहे हैं, पास्टर - पुरोहित भी भागे जा रहे हैं! उसने फादर  को भी देखा, वो भी अपना गट्ठर लिए चला जा रहा है। सबके गट्ठर हैं। और एक और बात हैरानी की मालूम हुई... किसी के पास छोटी-मोटी पोटली नहीं। क्योंकि वो सोचने लगा कि, “किससे बदलना है अगर बदलने का मौक़ा आ जाए। मगर सब बड़ी-बड़ी पोटलियाँ लिए हुए हैं। ये तो पोटलियाँ कभी दिखाई भी नहीं पड़ी थीं उसको।

अभिनय चलता है. चर्च  में पहुँच गए। बड़ा उत्‍तेजित! सारे लोग उत्‍तेजित हैं कि कुछ होने वाला है! और फिर एक आवाज़ हुई कि, “सब लोग चर्च  की खूँटियों पर अपनी-अपनी पोटलियाँ टाँग दें।”

सबने जल्दी से टाँग दीं। सभी छुटकारा पाना चाहते हैं। और फिर एक आवाज़ हुई कि, “अब जिसको जिसकी पोटली चुननी हो, चुन ले, बदल लें।”

और वो आदमी भागा! और सारे लोग भागे। मगर चकित होने की बात तो ये थी कि उस आदमी ने भाग के अपनी पोटली फिर से उठा ली, कि कोई दूसरा न उठा ले। और यही हालत सबकी थी... सबने अपनी-अपनी उठा ली।

वो बड़ा हैरान हुआ, लेकिन अब बात उसके ख़्याल में आ गई। उसने अपनी क्यों उठाई? सोचा कि, “अपने दुख कम से कम परिचित तो हैं; दूसरे का बड़ा पोटला है, और पता नहीं, इसके भीतर क्या हो! अपने दुख कम से कम जाने-माने तो हैं, उनके साथ जीते तो रहे हैं ज़िन्दगी भर, धीरे-धीरे अभ्यस्त भी हो गए हैं। और अब धीरे-धीरे उतना उनसे दुख भी नहीं होता।

काँटा गड़ता ही रहा हो, गड़ता ही रहा हो, गड़ता रहा हो तो धीरे-धीरे चमड़ी भी मज़बूत हो जाती है; उस जगह काँटा गड़ते-गड़ते-गड़ते, फिर चमड़ी में उतना दर्द भी नहीं होता। सिरदर्द ज़िन्दगी भर होता ही रहा तो धीरे-धीरे आदमी भूल ही जाता है... सिरदर्द और सिर में कोई फ़र्क़ हीनहीं नहीं रह जाता। एक अभ्यास हो जाता है।

और तब उसे समझ में आया कि सबने अपने-अपने उठा लिए... सब डर गए हैं कि, “कहीं दूसरे का न उठाना पड़े; पता नहीं दूसरे की अपरिचित पोटली, भीतर कौन से साँप-बिच्छू समाए हों!”

प्रत्येक ने अपनी-अपनी पोटलियाँ उठा लीं और सब बड़े ख़ुश हैं कि अपनी पोटली वापस मिल गई। और सब अपने घर की तरफ़ भागे जा रहे हैं। सुबह जब उसकी नींद खुली, तब उसे सच्चाई समझ में आई...

ऐसा ही है।

यहाँ सब दुखी हैं। मगर एक अभिनय चल रहा है।

इस अभिनय से जो जाग गया उसके जीवन में ही विशवाश  का जन्म होता है। अभिनय से जाग जाना मसीही जीवन  है। जो साक्षी हो गया वो जी गया । जिसने परमात्मा से प्रेम किया वही आनंद से पूर्ण है वही सुखी है।।

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