Wednesday, November 14, 2018

रिश्तों में सच्चाई|

हिंदी साहित्य में, सत्य और अर्ध सत्य शब्दों का बहुत महत्त्व है|अर्धसत्य उसे कहते हैं, जिसमे थोड़ा सत्य और थोड़ा असत्य हो|यह केवल मन को बहलाने वाला विचार है|सच में अगर झूठ मिला दो, तो वो सच नहीं रहता|जो सौ प्रतिशत सच है, वो ही सत्य की श्रेणी में आता है|रिश्ता वोही खरा होता है, जिसमे मिलावट न हो|जहां सच न हो, वहां छिपाने की आवश्यकता होती है|श्रेठ गीत में शुनेमिन कहती है--- मैं अपने प्रेमी की हूं, और मेरा प्रेमी मेरा है|अगर ये एक दूसरे के हैं, तो ये किसी और के नहीं हो सकते|आज रिश्तों में सच्चाई, बहुत बड़ा प्रश्न बना हुआ है|रिश्तों पर से, धीरे, धीरे विश्वास क्यों उठता जा रहा है|हमें किसी के कथन में बेईमानी की बदबू क्यों आती है|किसी शायर ने क्या ख़ूब कहा है---जादू है, तिलिस्म है, तुम्हारी जुबान में; तुम झूठ कह रहे थे, मुझे एतबार था|विश्वास टूटने पर कितनी, तकलीफ़ होती, ये तो टूटने वाला दिल ही जनता है|अगर इंसान आपसी रिश्तों के प्रति ईमानदार नहीं है, तो ईश्वर के प्रति ईमानदार कैसे रहेगा?भजन ७८.३७ में लिखा है---उनका ह्रदय परमेश्वर की ओर द्रढ़ ना था; ना वे उसकी वाचा के विषय, सच्चे थे|यह पद हमें, अपने गिरेबान में झांक देखने को मज़बूर करता है|अल्फाज़ों ने अपनी सच्चाई खो दी हैं, क्योंकि इंसान झूठा है|गिरगिट की तरह रंग बदलना, जीने की कला बन गया है|आज माहिर उसे कहते हैं; जो बड़ी सफाई से झूठ बोलता है|हम किस ओर  जा रहे हैं, ये चिंतन का विषय है|

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